नई दिल्ली, 19 अप्रैल।
देश में कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने की दिशा में उच्च मूल्य वाली फसलों के विस्तार पर विशेष जोर दिया जा रहा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में तटीय, उत्तर-पूर्वी और पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी फसलों को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई गई है, जिससे किसानों की आय बढ़ाने और उत्पादन में विविधता लाने का लक्ष्य तय किया गया है। पिछले दशक में कृषि क्षेत्र ने 4.45 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जिसमें बागवानी क्षेत्र की अहम भूमिका सामने आई है।
बागवानी अब कृषि अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार बनकर उभरी है, जिसमें फल, सब्जियां, मसाले और फूल जैसी फसलें शामिल हैं। ये फसलें पारंपरिक अनाज की तुलना में अधिक लाभ देती हैं और पोषण, रोजगार व निर्यात को भी बढ़ावा देती हैं। बागवानी क्षेत्र का योगदान कृषि उत्पादन मूल्य में लगभग 37 प्रतिशत तक पहुंच चुका है और इसका उत्पादन 2013-14 के 277.35 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 370.74 मिलियन टन तक हो गया है।
भारत वैश्विक स्तर पर भी बागवानी उत्पादन में प्रमुख स्थान रखता है। फल, सब्जी और आलू उत्पादन में देश दूसरे स्थान पर है, जबकि प्याज उत्पादन में अग्रणी है। इस क्षेत्र में वृद्धि के लिए सरकार ने क्षेत्र विशेष के अनुसार रणनीति बनाई है, जिसमें तटीय इलाकों में नारियल, काजू और कोको, उत्तर-पूर्व में अगरवुड तथा पर्वतीय क्षेत्रों में अखरोट और बादाम जैसी फसलों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
तटीय क्षेत्रों में नारियल उत्पादन से लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। भारत इस क्षेत्र में विश्व में दूसरे स्थान पर है। वहीं काजू और कोको जैसी फसलें भी निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। काजू को बंजर भूमि के उपयोग के लिए उपयुक्त माना जाता है, जबकि कोको को अंतःफसल के रूप में उगाकर अतिरिक्त आय प्राप्त की जा रही है।
उत्तर-पूर्वी राज्यों में अगरवुड की खेती तेजी से बढ़ रही है, जो सुगंधित उत्पादों और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं हिमालयी क्षेत्रों में अखरोट, बादाम और चिलगोजा जैसी फसलें किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही हैं। इन सभी पहलों के जरिए सरकार का उद्देश्य कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाना है।
















