नई दिल्ली, 01 मई।
देश और विश्व में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार के मामलों में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है। ताजा स्थिति के अनुसार अब प्रत्येक इकतीस बच्चों में एक बच्चा इससे प्रभावित पाया जा रहा है, जबकि पूर्व में यह अनुपात उन्यासी में एक का था। भारत में राष्ट्रीय स्तर के ताजा आंकड़े सीमित हैं, पर विशेषज्ञों का मानना है कि यहां भी मामलों में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के हालिया अध्ययन में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। बाल चिकित्सा विभाग की प्रोफेसर शेफाली गुलाटी ने कहा कि ऑटिज्म केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि लाखों परिवारों की वास्तविकता है। उन्होंने बताया कि बदलती जीवनशैली, बढ़ता प्रदूषण और सामाजिक बदलाव इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि अस्सी प्रतिशत से अधिक बच्चों में मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहार संबंधी समस्याएं और नींद की दिक्कतें भी साथ पाई जाती हैं, जिससे परिवारों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऑटिज्म के बढ़ते मामलों के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण सामने आए हैं, जिनमें आनुवंशिक कारण, जीन के कार्य करने के तरीके में परिवर्तन और पर्यावरणीय कारक शामिल हैं, जैसे प्रदूषण, खानपान और जीवनशैली। इसके शुरुआती लक्षण बारह से अठारह महीने की उम्र में दिखने लगते हैं, जिनमें बोलने में देरी, आंखों से कम संपर्क और सामाजिक व्यवहार में बदलाव प्रमुख हैं। समय पर पहचान और उचित देखभाल से बच्चों के विकास में उल्लेखनीय सुधार संभव बताया गया है।
















