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विज्ञान व प्रौद्योगिकी
06 Apr, 2026

वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक, अब फसलों और जंगली घास के परागकणों में होगा स्पष्ट अंतर

भारतीय वैज्ञानिकों ने नई तकनीक विकसित कर फसलों और जंगली घास के परागकणों में अंतर करना संभव बनाया, जिससे प्राचीन कृषि इतिहास समझने में मदद मिलेगी।

नई दिल्ली, 06 अप्रैल 2026।

भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नई विधि विकसित की है, जिसके माध्यम से खेती की गई फसलों और जंगली घासों के परागकणों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकता है। इस शोध से मध्य गंगा मैदान में कृषि की उत्पत्ति को समझने में नई दिशा मिलने की संभावना जताई गई है।

यह अध्ययन बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, जिसमें हजारों वर्षों में मानव समाजों द्वारा भूदृश्य पर पड़े प्रभाव और प्राचीन कृषि पद्धतियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण प्रस्तुत किया गया है।

अब तक वैज्ञानिकों के सामने यह बड़ी चुनौती थी कि गेहूं, चावल, जौ और मोटे अनाज जैसे अनाज वर्ग के पौधों के परागकण जंगली घासों से काफी मिलते-जुलते होते हैं, जिससे सूक्ष्मदर्शी के तहत उनका अंतर करना कठिन होता था। यही कारण था कि प्राचीन कृषि के साक्ष्यों को पहचानने में कठिनाई आती रही।

इस समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने 22 प्रकार की घास और अनाज प्रजातियों का अध्ययन किया। इसके लिए प्रकाश सूक्ष्मदर्शी और इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करते हुए परागकणों की पहचान के लिए स्पष्ट मानक तय किए गए।

अध्ययन में “युग्म जैवमितीय सीमा” का निर्धारण किया गया, जिसके अनुसार अनाज के परागकण सामान्यतः 46 माइक्रोमीटर से अधिक आकार के होते हैं और उनका वलय व्यास 9 माइक्रोमीटर से ज्यादा होता है, जबकि जंगली घासों के परागकण इससे छोटे पाए गए। यह मानक क्षेत्र विशेष के लिए तैयार किया गया है, जिससे प्राचीन अवशेषों की पहचान अधिक सटीक हो सकेगी।

इस खोज का विशेष महत्व मध्य गंगा मैदान के लिए है, जो देश का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र रहा है। इस नई विधि के जरिए वैज्ञानिक अब पुराने पर्यावरण, वनस्पति परिवर्तन और मानव गतिविधियों के प्रभाव को अधिक स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे।

अध्ययन में स्वदेशी आंकड़ों का उपयोग किया गया है, जो पहले प्रचलित यूरोपीय मॉडलों पर निर्भरता को कम करता है और भारत केंद्रित अनुसंधान को नई दिशा देता है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, यह खोज प्रारंभिक कृषि, भूमि उपयोग और पर्यावरण पर मानव प्रभाव के अध्ययन को अधिक सटीक बनाएगी। इससे पुरातत्वविदों और इतिहासकारों को गंगा के मैदानों के कृषि केंद्र के रूप में विकास को समझने में मदद मिलेगी।

यह शोध डॉ. स्वाति त्रिपाठी के नेतृत्व में किया गया, जिसमें विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों का सहयोग रहा। मंत्रालय ने इसे देश में कृषि और मानव बसावट के इतिहास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि बताया है।

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