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संपादकीय
23 Jun, 2026

अंतरिक्ष में 200 दिन: मानव शरीर का सबसे बड़ा परीक्षण

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 200 दिनों के अपने मिशन के दौरान, डॉ. अनिल मेनन मानव शरीर पर अंतरिक्ष के प्रभावों का गहन अध्ययन करेंगे। उनके द्वारा जुटाई गई यह महत्वपूर्ण जानकारी न केवल भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की राह आसान करेगी, बल्कि चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में भी नए द्वार खोलेगी।

भोपाल, 23 जून।

धरती से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर स्थित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन अगले 200 दिनों तक एक अनोखे वैज्ञानिक प्रयोग का केंद्र बनने जा रहा है। नासा के अंतरिक्ष यात्री डॉ. अनिल मेनन इस अवधि में केवल अंतरिक्ष यात्री की भूमिका नहीं निभाएंगे, बल्कि स्वयं एक जीवित प्रयोगशाला बनकर मानव शरीर पर अंतरिक्ष के प्रभावों का अध्ययन करेंगे। भारतीय मूल के डॉ. मेनन एक्सपीडिशन-74 और 75 मिशन के तहत सोयूज एमएस-29 यान से अंतरिक्ष स्टेशन पहुंचेंगे और वहां लंबे समय तक रहने के दौरान अपने शरीर में होने वाले बदलावों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करेंगे।

अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव लगभग समाप्त हो जाता है। यह स्थिति मानव शरीर के लिए असामान्य है, क्योंकि पृथ्वी पर शरीर की लगभग सभी जैविक प्रणालियां गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप विकसित हुई हैं। अंतरिक्ष में रक्त और अन्य तरल पदार्थ सिर की ओर बढ़ने लगते हैं, जिससे चेहरे पर सूजन, आंखों पर दबाव और दृष्टि संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके साथ ही हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है, मांसपेशियां कमजोर पड़ती हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली भी प्रभावित होती है। डॉ. मेनन इन सभी परिवर्तनों का नियमित अध्ययन करेंगे और प्राप्त आंकड़े पृथ्वी पर वैज्ञानिकों तक पहुंचाएंगे।

यह मिशन केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों, विशेष रूप से मंगल मिशन से है। पृथ्वी से मंगल तक की यात्रा में लगभग नौ महीने लग सकते हैं और वापसी में भी उतना ही समय लगेगा। ऐसे में अंतरिक्ष यात्रियों को डेढ़ वर्ष तक लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण की स्थिति में रहना पड़ सकता है। इतने लंबे समय तक मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझना अत्यंत आवश्यक है। डॉ. मेनन द्वारा एकत्रित किए जाने वाले आंकड़े भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए दवाओं, व्यायाम कार्यक्रमों और स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

डॉ. मेनन का अनुभव इस मिशन को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। वे स्पेसएक्स के पहले फ्लाइट सर्जन रहे हैं और आपदा क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाएं देने का व्यापक अनुभव रखते हैं। हैती और नेपाल के भूकंपों से लेकर माउंट एवरेस्ट बचाव अभियानों तक उन्होंने कठिन परिस्थितियों में काम किया है। यही अनुभव उन्हें अंतरिक्ष में चिकित्सा अनुसंधान के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बनाता है। स्वयं उनके शब्दों में, वे पहले भी डॉक्टर थे और अंतरिक्ष में भी डॉक्टर ही रहेंगे, फर्क केवल इतना होगा कि इस बार मरीज वे स्वयं होंगे।

इस मिशन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू अंतरिक्ष में चिकित्सा संसाधनों की उपलब्धता से जुड़ा है। डॉ. मेनन अंतरिक्ष स्टेशन के पुनर्चक्रित पानी से ग्लूकोज और सलाइन तैयार करने की तकनीक का परीक्षण करेंगे। अंतरिक्ष में पानी अत्यंत मूल्यवान संसाधन है और उसे पृथ्वी से पहुंचाना महंगा पड़ता है। यदि भविष्य में चंद्रमा या मंगल पर मानव बस्तियां स्थापित होती हैं, तो स्थानीय संसाधनों से चिकित्सा सामग्री तैयार करना अनिवार्य होगा। इस दिशा में यह प्रयोग महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत के लिए भी यह मिशन विशेष महत्व रखता है। भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्रियों की परंपरा में डॉ. मेनन एक नया अध्याय जोड़ रहे हैं। उनकी उपलब्धि उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो विज्ञान, चिकित्सा और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अपना भविष्य देख रहे हैं। साथ ही यह मिशन भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान कार्यक्रम के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। लंबे अंतरिक्ष अभियानों में मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जो जानकारी इस मिशन से प्राप्त होगी, वह भारतीय वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के लिए भी मूल्यवान होगी।

अंतरिक्ष अनुसंधान का लाभ केवल अंतरिक्ष यात्रियों तक सीमित नहीं रहता। अंतरिक्ष में हड्डियों और मांसपेशियों पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन पृथ्वी पर बुजुर्गों, लंबे समय तक बिस्तर पर रहने वाले मरीजों और विभिन्न शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के उपचार में भी मदद कर सकता है। पहले भी अंतरिक्ष कार्यक्रमों से विकसित कई तकनीकें आम जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। संभव है कि डॉ. मेनन के शोध से प्राप्त निष्कर्ष चिकित्सा विज्ञान में नए आयाम स्थापित करें।

विज्ञान के इतिहास में कई महत्वपूर्ण खोजें मानव साहस और जिज्ञासा का परिणाम रही हैं। डॉ. अनिल मेनन का यह मिशन भी उसी परंपरा का विस्तार है। अगले 200 दिनों तक वे अपने शरीर को वैज्ञानिक अध्ययन का माध्यम बनाकर न केवल अंतरिक्ष विज्ञान, बल्कि मानव स्वास्थ्य की समझ को भी नई दिशा देने का प्रयास करेंगे। उनकी यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि ज्ञान की खोज की कोई सीमा नहीं होती और मानवता की प्रगति के लिए कुछ लोग स्वयं को प्रयोग का हिस्सा बनाने का साहस रखते हैं।

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