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संपादकीय
01 Jul, 2026

सफेद कोट में धरती के भगवान

डॉक्टर्स डे पर समाज के प्रति चिकित्सकों के समर्पण, मानवीय सेवा और सुरक्षित कार्य वातावरण की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है।

नई दिल्ली, 1 जुलाई।

धरती पर भगवान दिखता नहीं, पर सफेद कोट में रोज मिल जाता है। कभी मुस्कुराकर, कभी डांटकर, तो कभी सिर पर हाथ फेरकर। उसका धर्म है जीवन बचाना और हमारा धर्म है उसका सम्मान करना। जब तक उसके गले में स्टेथोस्कोप है, तब तक मौत की रफ्तार थमती रहती है और जिंदगी की लौ जलती रहती है। डॉक्टर्स डे पर हर उस मसीहा को नमन, जो अपनी नींद गिरवी रखकर हमारी सांसों की हिफाजत करता है।

डॉक्टर्स डे केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उस जज्बे का उत्सव है जो मौत की दहलीज से जिंदगी वापस ले आता है। समाज डॉक्टर को धरती का भगवान इसलिए कहता है क्योंकि जब उम्मीद टूटने लगती है, तब वही नई आशा जगाता है। आधी रात का सन्नाटा हो, एंबुलेंस का सायरन गूंजे और स्ट्रेचर पर जिंदगी व मौत के बीच झूलता मरीज पहुंचे, तो डॉक्टर पल भर में फरिश्ता बन जाता है। दस्ताने चढ़ते हैं, मास्क कसता है और शुरू होती है सांसों की जंग। ऑपरेशन थियेटर में घंटों खड़े रहकर थकान भूल जाना कोई नौकरी नहीं, बल्कि इबादत है।

कोविड की काली रातों को कौन भूल सकता है, जब घरों के दरवाजे बंद थे और अस्पतालों के खुले। पीपीई किट में पसीने से भीगे डॉक्टर दिन-रात मरीजों के बीच डटे रहे। कई डॉक्टरों ने अपने परिवार से दूरी बनाई, कई अपनों के अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो सके। लौटे तो तालियां मिलीं, लेकिन उन्हें सम्मान के साथ सुरक्षा की भी जरूरत थी, ताकि किसी अगली महामारी में वे निडर होकर फिर सेवा कर सकें।

बड़े अस्पतालों की चमक से आगे बढ़कर उन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को भी देखिए, जहां सीमित संसाधनों के बीच डॉक्टर सैकड़ों मरीजों का इलाज करते हैं। कहीं बारिश में फिसलते हुए टीकाकरण, कहीं बाढ़ में दवा वितरण और कहीं दूर-दराज गांवों तक पहुंचकर गर्भवती महिलाओं की जांच—इन सबका उद्देश्य केवल एक है, दर्द कम करना।

डॉक्टर केवल दवा नहीं देता, हौसला भी देता है। कैंसर से जूझते बच्चे को मुस्कान लौटाता है, डायलिसिस पर लेटे बुजुर्ग को जीने की उम्मीद देता है। यही भरोसा कई बार सबसे बड़ी दवा बन जाता है।

दुर्भाग्य यह है कि जिन्हें हम भगवान कहते हैं, उन्हीं पर हिंसा भी होती है। मरीज की मौत के बाद अस्पतालों में तोड़फोड़ और डॉक्टरों से मारपीट चिंता का विषय है। डॉक्टर भी इंसान हैं, मशीन नहीं। उन्हें सुरक्षित वातावरण, सम्मान और न्याय मिलना चाहिए, क्योंकि डरे हुए हाथ न सफल सर्जरी कर सकते हैं और न ही विश्वास जगा सकते हैं।

इस डॉक्टर्स डे पर उन सभी चिकित्सकों को श्रद्धापूर्वक नमन, जो हर दिन अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखते हैं। आइए, हम संकल्प लें कि अस्पताल को अखाड़ा नहीं, सेवा और विश्वास का मंदिर मानेंगे।

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