नई दिल्ली, 13 जुलाई।
तमिल के प्रतिष्ठित कवि, साहित्यकार और गीतकार आर. वैरमुत्तु को सोमवार को वर्ष 2025 का 60वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। नई दिल्ली स्थित चिन्मय मिशन सभागार में आयोजित समारोह में वरिष्ठ राजनेता एवं चिंतक डॉ. कर्ण सिंह ने उन्हें सम्मानित किया। पुरस्कार के तहत 11 लाख रुपये की नकद राशि, वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा और प्रशस्ति-पत्र भेंट किया गया।
समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस दौर में भी साहित्य ही मनुष्य को संवेदनशील, सहिष्णु और मानवीय बनाए रखता है। उन्होंने युवाओं से भारतीय भाषाओं और साहित्य से गहरा जुड़ाव बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा, भाषाई विविधता और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।
ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रवर परिषद् की अध्यक्षा डॉ. प्रतिभा राय ने कहा कि आर. वैरमुत्तु की साहित्यिक साधना भारतीय भाषाओं की साझा सांस्कृतिक चेतना को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करती है। उनके साहित्य ने भाषाई सीमाओं से आगे बढ़कर भारतीय साहित्य की बहुभाषी परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की है।
भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी मुदित जैन ने स्वागत भाषण में कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय भाषाओं की समृद्ध साहित्यिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक है। उन्होंने आर. वैरमुत्तु के साहित्यिक योगदान को भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर बताते हुए उनका अभिनंदन किया।
सम्मान ग्रहण करने के बाद आर. वैरमुत्तु ने भारतीय ज्ञानपीठ के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि तमिल भाषा और पूरे भारतीय साहित्य का सम्मान है। अपने संघर्षपूर्ण जीवन और साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य मानवता की आशा, संवेदना और नैतिक शक्ति का सबसे बड़ा आधार है तथा यह सम्मान उन्हें आगे भी सृजन के लिए प्रेरित करेगा।
भारतीय ज्ञानपीठ की स्थापना वर्ष 1944 में भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से की गई थी। वर्ष 1961 में शुरू किया गया ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भाषा के ऐसे साहित्यकार को दिया जाता है, जिसने भारतीय साहित्य में आजीवन उल्लेखनीय योगदान दिया हो।
वर्ष 1965 से अब तक 60 वर्षों में 66 साहित्यकार इस प्रतिष्ठित सम्मान से अलंकृत हो चुके हैं। कार्यक्रम के अंत में भारतीय ज्ञानपीठ के महाप्रबंधक आर. एन. तिवारी ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, मीडिया प्रतिनिधियों और आयोजन में सहयोग देने वाले सभी लोगों का आभार व्यक्त किया।















