नई दिल्ली, 14 जुलाई।
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल ने गृहिणियों के योगदान को समाज में नई पहचान दिलाने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि घर संभालने वाली महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन करना लैंगिक समानता की ओर एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम है।
सोमवार रात इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक परिचर्चा के दौरान जस्टिस करोल ने स्पष्ट किया कि यह शुरुआत भविष्य में भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता के भाव को और अधिक मजबूत बनाएगी। उन्होंने इसे एक सकारात्मक और दूरगामी परिवर्तन बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं रक्षा वित्तीय सलाहकार डॉ. शिवाली चौहान ने कहा कि भारतीय संस्कृति में महिलाओं का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि आधुनिक दौर में किसी व्यक्ति के योगदान को मापने का पैमाना 'अर्थ' बन गया है, इसलिए महिलाओं के अथक परिश्रम को आर्थिक मान्यता देना अनिवार्य हो गया है।
इस विचार-विमर्श में देश के प्रबुद्ध वर्ग, शिक्षाविदों और कानून विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान गृहिणियों के अदृश्य श्रम को कानूनी और सामाजिक मान्यता देने के विभिन्न पहलुओं पर गहन मंथन किया गया।
संस्था 'जिज्ञासा' के अध्यक्ष राजकुमार भाटिया ने कार्यक्रम की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए आगामी योजनाओं की जानकारी दी। विशेषज्ञों ने इस विषय को और अधिक व्यावहारिक बनाने पर जोर दिया ताकि समाज में महिलाओं की स्थिति को और सशक्त किया जा सके।















